
प्रयागराज। इलाहाबाद हाईकोर्ट ने पुलिस मुठभेड़ों में अभियुक्तों के पैरों में गोली मारने की बढ़ती घटनाओं पर नाराजगी जताई है। हाईकोर्ट ने कहा, किसी भी आरोपी को सजा देने का अधिकार केवल न्यायपालिका के पास है, पुलिस के पास नहीं।
कोर्ट ने इसे कानून के शासन एवं सांविधानिक मर्यादाओं के खिलाफ बताते हुए राज्य सरकार और पुलिस अधिकारियों को सख्त दिशा-निर्देश जारी किए। इनकी अनदेखी पर अवमानना की कार्यवाही की चेतावनी भी दी।
जस्टिस अरुण कुमार सिंह देशवाल ने राजू उर्फ राजकुमार की जमानत अर्जी पर यह आदेश दिया। साथ ही, राजू को सशर्त जमानत दे दी।
सुनवाई के दौरान वकील कुसुम मिश्रा ने दलील दी कि याची को झूठे मामले में फंसाया गया। कथित मुठभेड़ में सुप्रीम कोर्ट के दिशा-निर्देशों का पालन नहीं किया गया।
पीठ ने इसे गंभीरता से लेते हुए अपर मुख्य सचिव (गृह) संजय प्रसाद व पुलिस महानिदेशक (डीजीपी) राजीव कृष्ण को वीडियो कॉन्फ्रेंसिंग के जरिये तलब कर जवाब मांगा था।
दोनों अधिकारी शुक्रवार को वीडियो कॉन्फ्रेंसिंग के जरिये हाजिर हुए और भरोसा दिलाया कि मुठभेड़ मामले में सुप्रीम कोर्ट के दिशा-निर्देशों का कड़ाई से पालन करने के लिए सर्कुलर जारी किए गए हैं। इनका पालन न करने पर कार्रवाई की जाएगी।
कानून में ऐसे कृत्यों की अनुमति नहीं
हाई कोर्ट ने कहा कानून की नजरों में ऐसे कृत्यों की अनुमति नहीं दी जा सकती है। भारत लोकतांत्रिक देश है। इसे संविधान के मुताबिक ही चलाना होगा, जिसमें विधायिका, कार्यपालिका और न्यायपालिका की भूमिका तय है।
पुलिस अधिकारियों को हाथ और पैर जैसे अंगों पर भी गैरजरूरी तरीके से गोली मारने की इजाजत नहीं दी सकती।
किसी पुलिसकर्मी को चोट न आने से संदेह होता है
पीठ ने कहा कि हाल के दिनों में छोटे-छोटे अपराधों, जैसे चोरी या लूट के मामलों में भी पुलिस की ओर से मुठभेड़ दिखाकर आरोपियों के पैरों में गोली मारने की घटनाएं सामने आ रही हैं। मौजूदा मामले में किसी भी पुलिसकर्मी को चोट नहीं आई है। इससे संदेह होता है।





