
नई दिल्ली। सुप्रीम कोर्ट ने मंगलवार को उत्तर प्रदेश सरकार से सवाल किया कि वर्ष 2021 में नोएडा में कथित घृणा अपराध के मामले में दर्ज प्राथमिकी में भारतीय दंड संहिता (IPC) के उचित प्रविधानों को क्यों नहीं लागू किया गया।
उत्तर प्रदेश की ओर से पेश एडिशनल सॉलिसिटर जनरल (एएसजी) केएम नटराज ने जस्टिस विक्रम नाथ और जस्टिस संदीप मेहता की पीठ को बताया कि उन्होंने संबंधित जांच अधिकारी के विरुद्ध जांच शुरू कर दी है। इस पर पीठ ने पूछा, ‘क्या इससे उचित प्रविधानों के तहत मामले का पंजीकरण नहीं होने की समस्या हल हो जाती है?”
जब विधि अधिकारी ने कहा कि उचित प्रविधानों के तहत प्राथमिकी दर्ज की जानी चाहिए थी, तो पीठ ने कहा, ‘अभी निर्देश दीजिए।’
न्यायालय जुलाई, 2021 में नोएडा में कथित घृणा अपराध में दुर्व्यवहार और यातना का शिकार हुए एक वरिष्ठ नागरिक की शिकायत पर निष्पक्ष जांच और सुनवाई के अनुरोध वाली याचिका पर सुनवाई कर रहा था।
याचिकाकर्ता के वकील हुजेफा अहमदी ने कहा कि प्राथमिकी आइपीसी की धारा 153-बी और 295-ए के तहत दंडनीय अपराधों के लिए दर्ज की जानी चाहिए थी।
अहमदी ने आइपीसी की धारा 298 का भी हवाला दिया, जो जानबूझकर धार्मिक भावनाओं को ठेस पहुंचाने के इरादे से अनुचित टिप्पणी से संबंधित है।
उन्होंने कहा कि ऐसी घटनाएं हो रही हैं और यह राष्ट्रीय एकता के लिए ठीक नहीं है। पीठ ने टिप्पणी की, ‘हमें इसे कोई रंग नहीं देना चाहिए।
यह एक व्यक्तिगत घटना है जिसके लिए आप इस अदालत में आए हैं। हमने आपकी याचिका पर सुनवाई की है और हम सरकार से कार्रवाई की अपेक्षा करते हैं। इसे यहीं खत्म करते हैं।’





