
ढाका। आज गुरुवार 12 फ़रवरी को बांग्लादेश में होने वाले आम चुनाव के नतीजे सिर्फ ढाका की सत्ता का फैसला नहीं करेंगे, बल्कि पूरे क्षेत्र की कूटनीतिक दिशा और रणनीतिक संतुलन को प्रभावित कर सकते हैं।
नई दिल्ली की नजरें खास तौर पर इन परिणामों पर टिकी हैं, क्योंकि संभावित सत्ता परिवर्तन भारत-बांग्लादेश संबंधों, सीमा सुरक्षा, पूर्वोत्तर की स्थिरता और क्षेत्रीय शक्ति संतुलन पर दूरगामी असर डाल सकता है।
बीएनपी की संभावित वापसी, चीन और अमेरिका की बढ़ती सक्रियता तथा भारत के आर्थिक और सामरिक हित, इन सबके बीच यह चुनाव दक्षिण एशिया की राजनीति में एक नए अध्याय की शुरुआत साबित हो सकता है।
यही वजह है कि जिस बेसब्री से इस चुनाव के परिणाम का इंतजार बांग्लादेश की जनता को है, नई दिल्ली में भी उससे कम नहीं है।
कौन-सी पार्टी है सबसे मजबूत?
बांग्लादेश में अभी चुनाव का जो माहौल है, उसको लेकर जानकार यह मान रहे हैं कि बीएनपी ही सबसे प्रमुख दल के तौर पर सामने आने वाली है।
पूर्व में जब बीएनपी की सरकार रही, तब भारत-बांग्लादेश संबंधों में खटास देखी गई थी। सीमापार उग्रवाद, अवैध घुसपैठ और सुरक्षा सहयोग जैसे मुद्दे विवाद का कारण बने थे।
हालांकि बीएनपी की नेत्री व पूर्व पीएम खालिदा जिया की मौत के बाद भारत ने इस बात के साफ संकेत दे दिए हैं कि वह मौजूदा माहौल में बांग्लादेश की इस सबसे बड़ी राजनीतिक दल के साथ तालमेल बैठाने को तैयार है।
खालिदा जिया के निधन पर विदेश मंत्री एस. जयशंकर का ढाका जाना और भारतीय संसद में उनके प्रति शोक प्रस्ताव व्यक्त करना इसी कूटनीतिक लचीलेपन का संकेत माना जा रहा है।
ढाका स्थित भारतीय उच्चायुक्त लगातार बीएनपी के नेताओं के साथ संपर्क में हैं। दूसरी बड़ी पार्टी इस बार चुनाव में जमाते-इस्लामी है। भारतीय उच्चायोग जमात के नेताओं के साथ भी संपर्क में है।
क्या है भारत की नीति?
भारतीय विदेश मंत्रालय का रवैया बांग्लादेश को लेकर अब यह साफ हो चुका है कि चुनाव में चाहे जिसकी भी सरकार आये, वह उसके साथ संबंधों को आगे बढ़ाने को लेकर उसी जज्बे के साथ काम करेगी जैसा पूर्व पीएम शेख हसीना के कार्यकाल में किया जा रहा था।
बीएनपी और जमात नेताओं के साथ होने वाली मुलाकातों के बारे में विदेश मंत्रालय के सूत्रों का कहना है अभी तक उक्त दोनों दलों के नेताओं की तरफ से ऐसा कोई संकेत नहीं आया है कि वह भारत के साथ संबंधों की अहमियत को कमतर कर रहे हों।
देखा जाए तो जिस तरह से बांग्लादेश में चीन, पाकिस्तान और अमेरिका की एक साथ गहरी रुचि जगी है, उसको देखते हुए भारत के पास और दूसरा विकल्प नहीं है।
बांग्लादेश व भारत के बीच 4,100 किलोमीटर लंबी सीमा है और पश्चिम बंगाल, असम, मेघालय, त्रिपुरा और मिजोरम की सुरक्षा, व्यापार और सामाजिक स्थिरता सीधे तौर पर बांग्लादेश की आंतरिक स्थिति से जुड़ी हुई है।





