Day: June 8, 2026
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आरबीआई एमपीसी की नीति पर टिप्पणी – साक्षी गुप्ता, प्रधान अर्थशास्त्री, एचडीएफसी बैंक
आरबीआई और सरकार ने आज रुपये पर दबाव कम करने के लिए भारतीय परिसंपत्तियों में पूंजी प्रवाह को बढ़ाने की…
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एचडीएफसी बैंक का ‘परिवर्तन’ कार्यक्रम पूरे उत्तर भारत में 3.26 लाख एकड़ से ज़्यादा खेत को पराली जलाने से बचाने में बना मददगार
– पंजाब और हरियाणा के 380 गांवों के 86,000 किसान इस पहल में हुए शामिल मुंबई,4 जून,2026: विश्व पर्यावरण दिवस के मौके पर, एचडीएफसी बैंक ने अपने सीएसआर कार्यक्रम ‘परिवर्तन’ के ज़रिए, सीआईआई फाउंडेशन के साथ मिलकर, अपनी ‘फसल अवशेष प्रबंधन’ (सीआरएम) पहल में एक बड़ी उपलब्धि की घोषणा की। 2025 के सीज़न में, पंजाब और हरियाणा के कुल 3,78,425 एकड़ खेतों में से 88 फ़ीसदी खेतों को पराली जलाने से बचाया गया। पंजाब के लुधियाना और संगरूर ज़िलों, और हरियाणा के फतेहाबाद ज़िले के 380 से ज़्यादा गांवों के 86,000 किसानों तक पहुँचने वाला यह कार्यक्रम, उत्तर भारत में खेती से होने वाले वायु प्रदूषण से निपटने के लिए निजी क्षेत्र की एक व्यापक और असरदार कोशिश है। धान की कटाई के बाद पराली जलाना, उस गंभीर वायु प्रदूषण के मुख्य कारणों में से एक है जो हर सर्दियों में पूरे उत्तर भारत को अपनी चपेट में ले लेता है। इससे आम जनजीवन अस्त-व्यस्त हो जाता है और दिल व फेफड़ों की पुरानी बीमारियाँ और भी बढ़ जाती हैं। लगभग 1/3 एकड़ खेत में पैदा होने वाली एक टन धान की पराली को जलाने से वातावरण में तीन किलोग्राम ‘पार्टिकुलेट मैटर’ (बारीक कण) घुल जाते हैं, साथ ही ज़मीन से ज़रूरी पोषक तत्व भी खत्म हो जाते हैं। 2025 में पंजाब और हरियाणा में पराली जलाने की घटनाओं में 53 फीसदी की कमी आने के बावजूद, छोटे और सीमांत किसानों को आज भी मशीनें हासिल करने और दो फसलों के बीच के कम समय में फसल के अवशेषों का प्रबंधन करने में कई मुश्किलों का सामना करना पड़ रहा है। अक्टूबर 2023 में लुधियाना में शुरू हुआ और 2024 में संगरूर और फतेहाबाद तक फैला, यह तीन साल का कार्यक्रम सीआईआई फाउंडेशन द्वारा 380 गांवों में लागू किया जा रहा है। अब तक, 8 गांवों ने पराली जलाने की प्रथा को पूरी तरह से खत्म कर दिया है, और 174 गांवों ने 90 फीसदी से अधिक ‘बिना जलाए’ ( नॉन बर्निंग) नियमों का पालन किया है। एचडीएफसी बैंक की सीएसआर प्रमुख नुसरत पठान ने इस उपलब्धि के बारे में बात करते हुए कहा, “पराली जलाना सिर्फ़ एक कृषि आदत नहीं है, यह एक व्यवस्थागत चुनौती है जिसकी जड़ें अर्थव्यवस्था, पहुंच और जागरूकता में हैं। एचडीएफसी बैंक परिवर्तन की सीआईइई फाउंडेशन के साथ साझेदारी ने इन तीनों पहलुओं को एक साथ संबोधित किया है। सहकारी टूल बैंकों के माध्यम से किसानों तक मशीनरी की पहुंच बनाकर, लगातार सामुदायिक जुड़ाव के ज़रिए व्यवहार में बदलाव लाकर, और बायोगैस व कम्पोस्टिंग जैसे ‘एक्स-सीटू’ (खेत के बाहर) समाधान पेश करके, हमने एक ऐसा मॉडल तैयार किया है जो किसानों के लिए वास्तविक बचत के साथ-साथ पर्यावरणीय परिणाम भी देता है। विश्व पर्यावरण दिवस के अवसर पर, हम इस प्रभाव को और आगे बढ़ाने की अपनी प्रतिबद्धता को दोहराते हैं।” इस कार्यक्रम की सफलता का आधार ‘सामुदायिक टूल बैंक’ का दृष्टिकोण 450 से अधिक कृषि मशीनें है जिनमें खरीदी गईं बेलर, सुपर सीडर, स्मार्ट सीडर और मित्र सीडर शामिल हैं और 140 से अधिक किसान सहकारी समितियों तथा किसान उत्पादक संगठनों (एफपीओज़) को दान की गईं, जिससे ये मशीनें किसानों को किफायती किराए पर उपलब्ध हो सकीं। पराली जलाने के सबसे ज़्यादा समय के दौरान, छोटे और सीमांत किसानों के लिए किराए पर 800 ट्रैक्टर उपलब्ध कराए गए। मशीनरी के उपयोग से ‘इन-सीटू’…
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